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सीखने की प्रवृत्ति को जाग्रत करने वाला पर्व गुरुपूर्णिमा 09 July, 2017

सीखने की प्रवृत्ति देने वाला प्रकाश पूर्णिमा है और सीखने की प्रवत्ति को जाग्रत करने वाला पर्व 'गुरुपूर्णिमा' है। गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। श्री वेदव्यासजी ने चारों वेदों का संपादन कर अनेक पुराणों की रचना की। पुराणों के माध्यम से उन्होंने मानव जाती को कल्याण का मार्ग दिखाया। जो कल्याण का मार्ग दिखता है, वह गुरु है। साधक इस व्यास पूर्णिमा पर गुरु पूजन करते है। अपने गुरु के प्रति सम्मान आदर प्रकट करने का यह दिन होता है। प्रकृति के अनुसार यदि हम चलते है तो आषाढ़ पूर्णिमा वर्षा के प्रारम्भ की घोषणा करती है। ग्रीष्म ऋतु में मेघो के पास जो संचित जल होता है, वह पृथ्वी पर आने के लिए उत्सुक रहता है, जो नवजीवन का प्रतिक है। यही समर्पण का भी प्रतीक है। साथ ही जो तत्व ज्ञान हमने अर्जित किया है, उसे सत्कार्य में परिणित करने का यह दिवस होता है। अनेक शिष्य गुरुपूर्णिमा से ही साधना प्रारम्भ करते है, क्योंकि इस दिन गुरु शिष्य पर कृपा बरसाते है। गुरु अपने शिष्य को भक्ति का मंत्र देते है। उस भक्ति से वह ईश्वर की आराधना कर अपने दिव्य गुणों का प्रसार और विस्तार करता है। भक्ति मंत्र के बदले में गुरु शिष्य से सत्कार्यों के प्रति समर्पण चाहते है। शिष्य के लिए गुरुपूर्णिमा इसलिए विशेष होती है कि जो कुछ आध्यात्मिक जगत में सीखा है, सुना है, देखा है, उन सबको एकत्रित करके विश्व प्रेम की भावनाओ को साकार करना, जिससे वसुधैव कुटुंब का भाव जाग्रत हो। पुरे वर्ष भर शिष्य इसी दिन की प्रतीक्षा करता है, क्योंकि गुरु की दृष्टि ही साधक के मोहपाश को काटती है और उसे नवीन राह दिखाती है। एक बार एक नवदीक्षित शिष्य ने गुरु से कहा- गुरुदेव उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की और चित्त दृढ़ नहीं होता। गुरु ने गंभीर दृष्टि डालकर शिष्य की और देखा और शिष्य से कहा- सच कहते हो वत्स, यहाँ ध्यान नहीं लगेगा। आज सायंकाल ही हम यहाँ से प्रस्थान करेंगे। शिष्य ने कुछ डरते हुए संकोच करते हुए पूछा- सायंकाल प्रस्थान करेंगे? गुरु ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया। गुरु शिष्य सायंकाल दूसरे स्थान पर प्रस्थान करने हेतु चल पड़े। शिष्य के हाथ में एक झोला था, जिसे वह बड़े यत्न से संभाल रहा था। चलते समय भी उसका ध्यान उस झोले पर अधिक था। मार्ग में एक कुआँ आया। दोनों ने अपनी प्यास बुझाई और थोड़ा विश्राम करने का सोचा। इतने में शिष्य ने शौच की आशंका जताई और गुरु को अपनी झोली देकर वह चल दिया। जाते- जाते अनेक बार उसने झोली की तरफ देखा। कुछ दूर जाने पर उसे धड़ाम एक तीव्र प्रतिध्वनि सुनाई दी। उसे यह अनुभव हुआ कि कोई वास्तु कुएं में समां गई है। शिष्य दौड़ा हुआ आया और चिंतित स्वर में बोला- गुरुवार, झोले में सोने की ईंट थी, वह कहां गई। गुरुदेव ने शांत स्वर में कहा- कुएं में चली गई। अब कहे तो चले या फिर पुनः अपनी जगह ही लौटें। अब तुम्हे ईश्वर में ध्यान लगने की कोई चिंता नहीं रहेगी। शिष्य ने एक दीर्घ श्वास छोड़ते हुए कहा- सच है गुरुदेव, आसक्ति का मन से परित्याग किये बिना कोई भी ईश्वर में मन नहीं लगा सकता। गुरु वह है जो आसक्ति को हमारे भीतर से निकाल कर शिष्य को भक्ति का मन्त्र देते है। इस भक्ति से शिष्य संतुष्टि की संपत्ति प्राप्त करता है, जिससे जीवन में अनेक समस्याओ का वह सामना करता है। गुरु कहते है समस्त जगत को गुरु स्वरूप देखो। गुरु वह है जो हमारे ज्ञान का विस्तार करते है। प्रकृति में प्रत्येक तत्व ऐसा है, जो हमें कुछ न कुछ गुण देता है। जब हम इस प्रकृति को समझते है, इसके गुण तत्व को समझते है तो हम सद्गुणी हो जाते है। भगवान दत्तात्रय ने स्वयं अपने जीवन में 24 गुरु बनाये और मानव जाती को यह बताया कि प्रत्येक पदार्थ में विशेष गुण होता है। उस गुण को हमें आत्मसात करना चाहिए। जब समस्त जगत को गुरु स्वरुप देखोगे तो प्रत्येक वस्तु का आदर करोगे। गुरु पूर्णिमा इसी संकल्प को स्मरण करने का दिवस है, जिससे अनंत सवेंदनाओ का विस्तार होता है और सत्कार्य मूर्तरूप लेकर हमारे सामने होते है। हम ग्रहणशीलता के मूर्तरूप बने। अपनी क्षुद्र अहम भावना से रिक्त रहे, तब प्रकृति की समस्त निधियां हमारे भीतर समाती है और शिष्य अपने श्वासों में उस शुद्धता को अनुभव करता है, जो पर्वत से गुजरने वाली हवाओं की तरह शुद्ध और सात्विक है। यही अनुभव ही गुरु पूर्णिमा है। 


'पितृ पक्ष' में पितरों का तर्पण सर्वकल्याणकारी 09 September, 2016

अपने पूर्वजों, पितरों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए 'पितृ पक्ष' के दौरान श्राद्ध कर्म एवं तर्पण करना नितान्त आवश्यक है। हिन्दू शास्त्रों में देवों को प्रसन्न करने से पहले, पितरों को प्रसन्न किया जाता है क्योंकि देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है। हिन्दू धर्म में श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन निर्धारित किए गए हैं ताकि हम अपने पूर्वजों को याद करें और उनका तर्पण कर उन्हें शांति और तृप्ति प्रदान करें, जिससे कि उनका आशीर्वाद हमें सदैव मिलता रहे, हमारा हर कार्य निर्विघ्न संपन्न होता रहे और हम सुख, शांति एवं समृद्धि के साथ अपना जीवन यापन कर सकें । जिन माता, पिता, दादा, दादी, प्रपितामह, मातामही एवं अन्य बुजुर्गों के लाड, प्यार, श्रम से कमाएं धन एवं इज्जत के सहारे हम और आप सुखपूर्वक रहते हैं, तो हमारा परम कर्तव्य बनता है कि हमारे इन परिवारों के बुजुर्गों, जिनका शरीर पंच तत्व में विलीन हो गया है, उन्हें पितृ पक्ष के दौरान तर्पण देकर, उनके नाम से दान दक्षिणा कर तथा उनके नाम से पर्यावरण संरक्षण हेतु पौधा रोपण कर उनके प्रति अपने अटूट श्रद्धा को अर्पित करें तथा पितृलोक में उन्हें प्रसन्न रख कर उनका यथेष्ठ आशिर्वाद प्राप्त करें।


यदि हम अपने पूर्वजों के प्रति चाहे वो हमारे अपने माता, पिता, पितामह और प्रपितामह, मातामही या प्रमातामह हों, किसी भी तरह का असम्मान प्रकट करते  हैं, उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य करते हैं, तो हमें अपने पितरों के कोप का भाजन बनना पड़ता है और हमें पितृ दोष की अति कठोर पीड़ा झेलनी पड़ती है। पर हममें से अधिक लोग कामकाजी, नौकरीपेशा एवं अपने व्यावसायिक कार्यों में व्यस्त होने के कारण, अपने पितरों को पितृ पक्ष के दौरान तर्पण नहीं अर्पित कर पाते और इसका परिणाम हमें आनेवाले समय में ना चाहते हुए भी भुगतना पड़ता है। अतः पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों को तर्पण देना हिन्दू वंश में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति का परम एवं पुनीत कर्तव्य है।

परम पूज्य सदगुरु श्री भय्यूजी महाराज की पावन उपस्थिति में प्रत्येक वर्ष पितृ पक्ष के दौरान इंदौर स्थित 'सूर्योदय आश्रम' पर विद्वान् पंडितों के वैदिक पद्धति से कराये गए मंत्रोच्चार के बीच सैकड़ों धर्मावलंबियों के पूर्वजों की स्मृति में तर्पण कराया जाता है। इस पितृ पक्ष सूर्योदय परिवार द्वारा आगामी 16 सितम्बर से 30 सितम्बर के बीच पर्यावरण संरक्षण एवं उसके शुद्धिकरण हेतु 11,000 फलदार एवं औषधीय पौधों को रोपित करने का संकल्प लिया गया है। आप सभी महानुभाव पितृ पक्ष के अवसर पर आयोजित इस पुनीत कार्य में सहभागी होकर अपने पितरों के नाम पौधा रोपित कर सकते हैं, उन्हें तर्पण दे सकते हैं एवं उनके नाम पर दान कर पूण्य प्राप्त कर सकते हैं। यदि आपके पास अपने पितरों को तर्पण देने हेतु समयाभाव है तो सूर्योदय परिवार आपके इन सभी पूण्य कार्यों को करवाने की जिम्मेदारी लेता है।

सूर्योदय परिवार द्वारा समाज में साक्षरता बढ़ाने के लिए सार्थक प्रयास 08 September, 2016

दुनिया में शिक्षा और ज्ञान बेहतर जीवन जीने के लिए ज़रूरी माध्यम है।जीवन में शिक्षा एवं साक्षरता का बहुत महत्व है।  साक्षरता का तात्‍पर्य सिर्फ़ पढ़ना-लिखना ही नहीं बल्कि यह सम्मान, अवसर और विकास से जुड़ा विषय है। वर्तमान में भारत में साक्षरता दर वर्ष 2011 के जनगणना के अनुसार 75.06% है, जो  विश्व की साक्षरता दर 84% से कम है।  यद्द्यपि हमारे देश में केंद्र एवं राज्य स्तर सरकारों द्वारा साक्षरता की दर को बढ़ाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में काफी सराहनीय प्रयास किये गए हैं, पर सच यह है कि भारत में अभी भी संसार की सबसे अधिक अनपढ़ जनसंख्या निवास करती है| हमें इस `कलंक' को सामूहिक प्रयास से ख़त्म करना होगा।  इसके लिए आवश्यक है पुरुषों  के साथ-साथ महिलाओं में साक्षरता की दर को तीव्र गति से बढ़ाना। 
हमारे देश में जहाँ पुरुषों की साक्षरता दर 82.14 है वहीं महिलाओं में इसका प्रतिशत मात्र 65.46 प्रतिशत है।  महिलाओं में कम साक्षरता का कारण अधिक आबादी और परिवार नियोजन की जानकारी की कमी है। मुझे यह कहते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हमारा ट्रस्ट एवं सूर्योदय परिवार समाज में, विशेष कर गरीबों, पारितज्य। महिलाओं एवं समाज के सबसे नीचे तबकों में साक्षरता को प्रोत्साहन देने के लिए विभिन्न स्तरों पर कार्य कर रहा है। आज हमारा ट्रस्ट अपने उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से  मध्य प्रदेश  एवं महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में विद्यालयों की स्थापना कर  हज़ारों गरीब तबकों, सूखा एवं आत्महत्या ग्रस्त किसानों, कैदियों, पारधी समाज एवं अनाथ बच्चों को शिक्षित कर ना सिर्फ उन्हें संस्कारित कर रहा है बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्म निर्भर भी बना चूका है।  इसके आलावा छात्रवृति योजना के माध्यम से भी लाखों गरीब परिवारों के बच्चों को  आर्थिक सहायता प्रदान कर, स्टेशनरी, मुफ्त किताबों का वितरण कर उन्हें अपनी स्कूली शिक्षाओं को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।      

आज विश्व साक्षरता दिवस पर में प्रत्येक देशवासियों से अपील करता हूँ कि वो अपने पुत्रों के साथ अपनी पुत्रियों को आवश्यक रूप से ना सिर्फ साक्षर बनाएं बल्कि उसे शिक्षा प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनने का  प्रचुर अवसर दें और उसके सपनों एवं महत्वकाँछों को साकार करने में पूर्ण सहयोग दें।

श्री गणपति आदर्शों के संस्थापक हैं - श्री भय्यूजी महाराज 01 September, 2016

श्री गणपति आदर्शों के संस्थापक हैं - श्री भय्यूजी महाराज

 

भारतीय संस्कृति आदर्शों की संस्कृति है। हमारी संस्कृति में श्री राम, श्री कृष्ण के आदर्शों को हम व्यवहार में लाते हैं। साथ ही अन्य देवी-देवताओं की उपासनाकरते हैं। उसके पीछे भी यही उद्देश्य होता है कि उनके गुणों को उनके आदर्शों को हम आत्मसात करें। श्री गणेश भी ऐसे ही देव हैं, जिनके स्वरूप, आयुध मुद्रा आदिके द्वारा मानव जाति का हित निहित है। श्री गणपति के सदगुणों का चिंतन कर उनका स्मरण करें, उनकी उपासना करें। 

मनुष्य जब भी अपना नेता चुनता है तो पहले नेता के गुणों को देखता है। सभी देवों ने गणनायक के रूप में गणपति को चुना है। श्री गणपति के मस्तक पर चंद्र है,वह भालचंद्र कहलाते हैं अर्थात वे शांत हैं और चंद्र अनेक कलाओं का ज्ञाता है। ऐसे चंद्र को उन्होंने अपने मस्तक पर रखा है तो स्वयं गणपति भी सभी कलाओं केज्ञाता है। अच्छे जीवन के लिए हमें सिर्फ भौतिक दृष्टि ही पर्याप्त नहीं है। हमें लौकिक दृष्टि की भी आवश्यकता होती है। इस लौकिक दृष्टि को देखने के लिए तीसरानेत्र चाहिए अर्थात अंतर की दृष्टि चाहिए। श्री गणपति के तीनों नेत्र यह बताते है कि वे भौतिक जगत को तो देखते ही हैं, साथ में अलौकिक जगत को भी देखते हैंऔर दोनों में समन्वय बनाने की प्रेरणा देते हैं। 

जो गणनायक होता है, उसे सभी की समस्या सुनना होती है तथा सभी के साथ प्रसन्न मुद्रा में रहना होता है। श्री गणपति की मुद्रा प्रसन्न रहती है तथा मस्तिष्कभी विशाल है। उनका महामस्तक ही अनेक पुरुषों की समस्याओं को सुन सकता है और उन्हें संतुष्ट रख सकता है। सबके मन की बात को जानने के लिए उनकीदीर्घ नासिक है, जो अंतः स्थल को सूंघ सकते हैं अर्थात उसका पता लगा सकते हैं। ऐसे श्री गणेशजी की लम्बी सूंड है। उनके वक्रतुण्ड होने का तात्पर्य है किसामाजिक कार्य करने वाला दूसरों के विरोध की परवाह नहीं करता और उस और ध्यान नहीं देता और अपना कार्य करता रहता है। ऐसे ही श्री गणेश हैं। उनके बड़ेकान और विशाल उदर भी यही दर्शाता है कि वे सबकी समस्याओं को गंभीरता से सुनते हैं और किसी का भी अनादर नहीं करते। उनका रक्तवर्ण वस्त्र यह दर्शाता हैकि वे सभी को स्नेहमयी दृष्टि से देखते हैं। उनके श्वेत वस्त्र भी यही दर्शाते हैं कि समाज में रहने वाले सभी लोगों को एक-दूसरे के प्रति पवित्र भाव रखना चाहिए।अपने हाथों की अभय मुद्रा से वे ये बताते है कि जो गणनायक है, उसे अपने अहंकार और स्वार्थ में नहीं रहना चाहिए, बल्कि दूसरों के कल्याण के लिए तत्पर रहनाचाहिए। उनके हाथों में अंकुश तथा पाश है। जो लोग दुराचारी हैं, उन पर अंकुश लगाना आवश्यक है और पाश से प्रेम का आकर्षण देकर वे एक-दूसरे को परस्परसदभावनाओं के लिए प्रेरित करते हैं। 

श्री गणेश के दोनों और रिद्धि-सिद्धि विराजमान है। वे कहते हैं कि जो स्त्रियां अपने पति का आदर करती हैं, सत कार्यों में उसका सहयोग करती है, वे  रिद्धि-सिद्धिबन जाती हैं। स्वामी को अपने अधीनस्थ सेवा कार्य में रहने वाले के प्रति तुच्छ भाव प्रकट नहीं करना चाहिए, चाहे अधीनस्थ कितना भी छोटा हो, इसलिए उन्होंनेवाहन के रूप में मूषक को रखा है। भगवान गणपति दो माताओं का आदर करते हैं एक गौरी और दूसरी गंगा। वे दोनों ही माताओं का आदर करते हुए यह दर्शाते हैंकि माताओं का आदर करना चाहिए। श्री गणपति अनेक सदगुणी तत्वों के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उनकी आराधना कर हम अपने सदगुणों को बढ़ाएं। 

जय हिंद, जय भारत !!


`MANAVTA KA MAHAKUMBH': A CELEBRATION OF SOCIAL INITIATIVES’ SUCCESSES FOR MARATHWADA 25 July, 2016

When we talk about Marathwada, comes in mind pictures of long stretch of parched barren land with no water, womenfolk going barefoot for kilometers carrying pitchers either over their heads or in their armpits to fetch potable water with no guarantee whether they will be able to collect it at least to quench thirst of their children, leave alone cooking.

The perennial problems of drought that had been hitting the region for the past several decades has brought about untold miseries, mostly for the poor farmers, prompting them to commit suicides. With the largest number of suicide cases by the farmers being reported from this region, Marathwada has almost become the suicide capital for farmers in the country with over 300 farmers suicides were reported in the first four months of the current year from the region.

A thorough study of the pattern of farmers' suicides in the region has revealed that the factors which have mostly triggered the tendencies of committing  suicides among farmers include monsoon failure, high debt burdens, personal issues among others.

Apparently moved by the compelling and pitiable circumstances of the farmers of Marathwada region, me and my Trust -- Shree Sadguru Datta Dharmik Evam Parmarthik Trust has taken pledge  to make Marathwada and its people free from calamities, free from poverty, social maladies and all things which have compounded their miseries and made their lives miserable.

Though we had been actively working in the Marathwada region for over one decades, compelling circumstances of the drought and poverty stricken of people there, prompted us to rework our strategy, chalk out a compact action plan to get rid Marathwada and its people free from all calamities and help the region move ahead on the path of development

Accordingly we chalked 21-point action plan on agricultural, social, health, educational, water conservation projects for the socio-economic upliftment of the poor and the farmers of Marathwada

With the available resources that we have, our trust has been working untiringly to make this region full of water through our water conservation project. Since the launch of this project, our Trust with help of our dedicated volunteers and philanthropic people has deepened and widened as many as 426 nullahs in Beed and Osmanabad dists of Mahrashtra.  We recently completed digging and widening of a 8 km long canal in Osmanabad dist in a record time. This canal is now full of water in the pre-monsoon rains that hit the region recently.

Unnerved by increasing number of suicides in the region, our Trust has provided grains among 2,500 suicide hit farmers' families in Beed and Osmanabad dists. Not only this,  we have also taken responsibilities of providing employment to unemployed members of suicide hit families and educate their children through our own resources.

To help farmers, improve agriculture yields even during the scanty rainfall, we have  decided to distribute  improved seeds among 15,000 farmers of the region. To improve fertility of the soil of the drought hit region, we are currently running land reform scheme in as many as 153 villages of Beed district.

These are not isolated cases, there are several agriculture, educational, health, community development projects being run by our Trust in the region as well as in other parts of the country successfully.

The kind of initiatives that we have taken to improve the plight of farmers, the poors in the calamity hit regions of Marathwada in Maharashtra have come in for wide appreciations from various quarters and it keeps us motivating to continue our social works with renewed vigor and enthusiasm.

I am pleased to inform that many of our pledges that we had taken in the beginning of the current year have been completed well before their stipulated time period. We celebrated these successes at `Manavta Ka Mahakumbh’ concluded at Beed recently. The inspiring words of  the RSS Sarsanghchalak who was the chief guest at Manavta Ka Mahakumbh and glorifying testimonies to  our commitments towards Marathwada and its people.

MANAVTA KA MAHAKUMBH: AN INITIATIVE TO MAKE MARATHWADA FREE FROM CALAMITIES 21 June, 2016

Manavta Ka Mahakumbh: An initiative to 
make Marathwada free from calamities

When we talk about Marathwada, comes in mind pictures of long stretch of parched barren land with no water, womenfolk going barefoot for kilometers carrying pitchers either over their heads or in their armpits to fetch potable water with no guarantee whether they will be able to collect it at least to quench thirst of their children, leave alone for cooking.
The perennial problems of drought that had been hitting the region for the past several decades has brought about untold miseries, mostly for the poor farmers, prompting them to commit suicides. With the largest number of suicide cases by the farmers being reported from this region, Marathwada has almost become the suicide capital for farmers in the country with over 300 farmers suicides were reported in the first four months of the current year from the region.
A thorough study of the pattern of farmers' suicides in the region has revealed that the factors which have mostly triggered the tendencies of committing  suicides among farmers include monsoon failure, high debt burdens, genetically modified crops, government policies, public mental health, personal issues among others.
Apparently moved by the compelling and pitiable circumstances of the farmers of Marathwada region, spiritual saint Bhaiyyuji Maharaj, despite living hundreds of kms away from this region, decided to make Marathwada region of Maharashtra as his `karm bhoomi' (work place) about a decade back, primarily to improve socio-economical conditions of the poor, the farmers as well as the underprivileged sections of the society. Since then there has been no looking back for him. In the past over one decade, Bhaiyyu Maharaj through his Trust -- Shree Sadguru Datta Dharmik Evam Parmarthik Trust with its headquarter in Indore, has launched a large number of agriculture, social, health, educational, water conservation projects for the socio-economic upliftment of the poor and the farmers of Marathwada

With the available resources that he has, Bhaiyyu Maharaj through his trust has been working untiringly to make this region full of water through his water conservation project. Since the launch of this project, his Trust with help of its volunteers and philanthropic people has deepened and widened as many as 426 nullahs measuring a length of about 45 kms in Beed and Osmanabad dists of Mahrashtra. His Trust recently completed digging and widening of a 8 km long canal in Osmanabad dist in a record time. This canal is now full of water in the pre-monsoon rains that hit the region recently.
Unnerved by increasing number of suicides in the region, the spiritual saint through his trust has provided grains among 2,500 suicide hit farmers' families in Beed and Osmanabad. Not only this, he has also taken responsibilities of providing employment to unemployed members of suicide hit families and educate their children through his own resources.
To help farmers, improve agriculture yields even during the scanty rainfall, his trust has distributed genetically improved seeds among 10,000 farmers of the region. To improve fertility of the soil of the drought hit region, his trust his currently running land reform scheme in as many as 153 villages of Beed district.
These are not isolated cases, there are several agriculture, educational, health, community development projects being run by Bhaiyyu Maharaj in the region as well as in other parts of the country successfully.
The projects being run by Bhaiyyu Maharaj, especially in the calamity hit region of Marathwada in Maharashtra has come in for wide applause from dignitaries from all walks of life. Among these luminaries include the RSS Sarsanghchalak Dr Mohan Bhagwat. Highly inspired by the social initiatives of Bhaiyyu Maharaj, the RSS chief, a well-know thinker, scholar and a social revolutionary, has enthusiastically associated himself to promote path-breaking social initiatives of the spiritual saint so that more and more people engage themselves in social initiatives for alleviating  sufferings of the poor, the farmers and the downtrodden. 

To celebrate accomplishments of Bhaiyyu Maharaj and his trust towards making Marathwada  a calamity free region, the RSS chief Dr Bhagwat will grace a mega event -- `Manavtak Ka Mahakumbh' being organized in Beed on June 25 this month. According to Bhaiyyu Maharaj, the `Manavtak Ka Mahakumbh' aims at spreading the message of his social initiatives and how people can join him or can work independently towards making Marathwada free from all calamities and make it as one of the most developed regions of the country. The event, he said, will also inspire people to carry out similar initiatives in other drought and calamity hit regions of the country.

OUR RESOLUTIONS FOR MARATHWADA FOR THE YEAR 2016

1. Under Seeds Distribution project, we will be distributing improved quality seeds among 21,000 farmers of Beed and Osmanabad dists, while maize seeds and genetically improved organic seeds are being distributed among 3,500 farmers of Bundelkhand and Khamgaon in Osmanabad.

2.Under Suryoday Water Conservation scheme, we are digging and widening 428 nullahs with total length equivalent to 45 kms in Beed and Osmanabad dists, while construction of 101 ponds is underway in Shujalpur dist of Madhya Pradesh.

3.Under Jeev Daya Abhiyaan, we have distributed 101 water tanks with a capacity of 1,000 litres each at Nandurbaar and Malkapur in Maharashtra and Neemuch in Madhya Pradesh.

4.We intend to distribute scholarship among 10,000 children of the poor and marginal farmers as well as children of prisoners and people of Pardhi community under our Suryoday Scholarship Scheme  in Beed, Osmanabad and Aurangabad dists of Maharashtra.

5.Under Suryoday Aadhar Yojna, we have distributed health cards among 3 lakh elderly farmers of Beed, Osmanabad, Manmaad and Indore. The health cards have enabled these elderly poor farmers to get medical treatment and medicines at concessional rates at selected government and private hospitals.

6.Under Suryoday Grains Distribution scheme, we are distributing grains, ration and literary material among suicide hit families of 5,000 farmers in Beed, Osmanabad and Bundelkhand dists.

7. We will be distributing 25 pairs of buffaloes among farmers in Beed and Osmanabad so as to enable them to carry out farming properly without burdening themselves.

8.To provide free of cost education to children of marginal farmers we will be opening 50 centres.

9.101 water tanks will be distributed in Beed dist for the cattle for drinking purpose.

10. To enable farmers' children pursue study and do other household works, we will be distributing 1,000 bicycles among farmers' children in Beed and Osmanabad dists of Maharashtra.

11. Land Reform Scheme is being carried out in as many as 153 villages of Beed dist.

12. Nutritious diet will be made  available among 2,500 families at Nandurbar under Malnutrition Eradication Scheme of our Trust.

13. Under Suryoday Cloth Bank, 19,000 pieces of clothes have been distributed in Nandurbaar dist.

14. Under Shavdaah Yojna, we have distributed one AC coffin and a vehicle in Shujalpur dist of Madhya Pradesh.

15. Under Baalgram Yojna, fruit bearing trees are being distributed in as many as 150 villages of Nandurbaar.

16. Three dams have been constructed in Nandurbaar with peoples' participation under Suryoday Abhyaaran Punarwasan YOjna.

17. Mobile chemical laboratory named as Suryoday Vigyaan Rath will be distributed in as many as 78 schools of Aurangabad dist, primarily to check soil fertility.

18. A soil and water testing mobile laboratory has been provided in Beed to check quality of soil and water in the district.

19. Under Prisoners Rehabilitation Scheme, computers and teachings to prisoners will be imparted in Beed and Osmanabad districts.

20. Suryoday Sammishra school will be opened in Osmanabad to impart teaching to  children of suicide affected farmers' families, Padhi community, etc.

21. Suryoday Middle and Higher Secondary school will be opened in Osmanabad dist.

आदर्श पिता ही आदर्श संतान को जन्म दे सकता है | 01 May, 2016

जीवन को देखने की दृष्टि सभी की अलग-अलग होती है | कुछ इसे साधारण मान यूं ही गवां देते हैं तो कुछ अपने कर्मों की सार्थकता से इसे अर्थ प्रदान कर जाते हैं | ऐसी ही एक असाधारण व्यक्तित्व स्व. श्री विश्वासरावजी देशमुख थे, जिनके कर्मों की सुगन्ध से वातावरण आज भी महक रहा है | उन्हीं की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा उनके जीवन से अन्य व्यक्ति भी प्रेरित हो सकें, इस हेतु सद्गुरु श्री भय्यूजी महाराज की प्रेरणा से सूर्योदय परिवार द्वारा कई सेवा-प्रकल्प चलाए जा रहे हैं | इनसे समाज के कई वर्गों को प्रत्यक्ष लाभ हो रहा है | पूज्य बापू स्व. श्री विश्वासरावजी देशमुख की पुण्य-स्मृति में सूखा-पीड़ित क्षेत्रों हेतु सूर्योदय परिवार द्वारा सबसे पहले १०० टंकियों वितरण किया गया| आपकी ही स्मृति में सूर्योदय स्वर्गारोहण योजना भी चलाई जा रही है | इसमें लावारिस मृत देहों का अन्तिम-संस्कार उनके धर्म की मान्यताओं के अनुसार किया जाता है, इस वर्ष इसका विस्तार म.प्र. तथा महाराष्ट्र के १० जिलों में किया गया |

एक आदर्श पिता ही आदर्श संतान को जन्म दे सकता है | बच्चे को जैविक रूप से जन्म देना ही पर्याप्त नहीं है | यदि संतान को योग्य संस्कार न दिए जाएं तो माता-पिता के कर्तव्यों का समग्र निर्वहन नहीं हो सकता | एक व्यक्ति पिता के रूप में आदर्श स्थापित करने हेतु प्रेरित हो, इस हेतु सूर्योदय परिवार द्वारा पूज्य बापू स्व. श्री विश्वासरावजी देशमुख की पुण्य-स्मृति में ‘आदर्श पिता पुरस्कार योजना’ प्रारम्भ की गई है |

मनुष्य को प्यास लगने पर वह इसे बुझाने हेतु कोई न कोई उपाय योजना निकाल लेता है; किन्तु मूक पशु कहाँ जाए ? किससे कहें ? उन्हें भी उनके अधिकार अनुसार जल उपलब्ध हो, इस हेतु सूर्योदय परिवार द्वारा विभिन्न स्थानों पर जीवदया अभियान के अन्तर्गत ५०० जल-कुण्डों (होदों) की स्थापना की गई |

भारत में किसानों की स्थिति अत्यन्त दारुण है | कई किसान आर्थिक रूप से इतने निर्धन हैं कि कृषि के लिए आधारभूत (बुनियादी) व्यवस्थाएं करने में भी असमर्थ हैं | यहाँ तक कि बीज की व्यवस्था कर पाना भी उनके लिए एक चुनौती है | जब किसान बीज की व्यवस्था करने के लिए भी साहूकारों के ऋण पर निर्भर हो तब तो स्थिति और भी दयनीय हो जाती है | सद्गुरु श्री भय्यूजी महाराज की प्रेरणा पूज्य बापू स्व. श्री विश्वासरावजी देशमुख की पुण्य-स्मृति में सूर्योदय परिवार द्वारा इस वर्ष ५००० किसानों को निःशुल्क बीज वितरण किया गया |

पूज्य बापू स्व. श्री विश्वासरावजी देशमुख की पुण्य-स्मृति में सूर्योदय भूमि सुधार योजना भी चलाई जा रही है | इसके अन्तर्गत भूमि का उपचार कर उससे कम लागत में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उपज प्राप्त करने का प्रशिक्षण दिया जाता है | इस कार्यक्रम के अन्तर्गत मिट्टी के परीक्षण हेतु चलित प्रयोगशाला, रासायनिक खाद के बदले जैविक खाद, कम्पोस्ड खाद, कचरे का कम्पोस्ड खाद, वर्मी कम्पोस्ड, जीवाश्म कम्पोस्ड, दशपर्णी खाद, निम्बोली अर्क और पाउडर का कीटनाशक के रूप में उपयोग करने के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है | इस हेतु वर्ष..........परली (महा.) के १२५ ग्रामों में तथा वाशिम ले १०० गांवों में सूर्योदय परिवार द्वारा भूमि सुधार अभियान चलाया जाएगा |

आज पर्यावरण का असंतुलन विश्व की प्रमुख समस्याओं में से एक है | लगभग पूरा विश्व ही पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त है | यज्ञ इस समस्या का समाधान है तथा इससे प्राप्त लाभों को दृष्टिगत रखते हुए सूर्योदय परिवार नियमित रूप से पूज्य बापू स्व. श्री विश्वासरावजी देशमुख की पुण्य-स्मृति में राष्ट्र चेतना महापर्यावरण यज्ञ का आयोजन करता है, इसमें आज की आवश्यकता के अनुसार लकड़ी का नहीं अपितु गाय के गोबर के कंडों का प्रयोग किया जाता है | इन्हीं यज्ञों के पूर्णाहुति के रूप में सघन वृक्षारोपण भी किया जाता है, अब तक इनके माध्यम से २ लाख ६४ हज़ार ८५३ पौधों का रोपण किया जा चुका है, वर्ष...... २ लाख नए पौधे लगाने का लक्ष्य पूर्ण किया गया  |

सूर्योदय शीत ऋतु मानवता सेवा अभियान के अन्तर्गत कम्बल वितरण भी बड़े पैमाने पर किया गया अब तक....... लोगों को कम्बल वितरित किए जा चुके हैं|

भीषण गर्मी में प्यास से मरते निरीह पक्षियों के लिए पानी हेतु पूज्य बापू स्व. श्री विश्वासरावजी देशमुख की पुण्य-स्मृति में जीवदया अभियान के अन्तर्गत सकोरा वितरण कार्यक्रम को गति प्रदान की जाएगी | सूर्योदय परिवार द्वारा जीवदया अभियान के अन्तर्गत पंढरपुर, उस्मानाबाद तथा सोलापूर में २५००० सकोरों का वितरण सूर्योदय परिवार द्वारा किया गया | साथ ही पशुओं के पीने के पानी हेतु ५०० जल-कुण्डों (होदों) की स्थापना की गई | जल संधारण योजना के अन्तर्गत शुजालपुर (म.प्र.), जलगांव, उस्मानाबाद, बीड, सोलापूर तथा औरंगाबाद में १००-१०० तथा सातारा (महा.) में २०० नये तालाबों के निर्माण किया गया है. कन्यादान योजना के अन्तर्गत शुजालपुर में ५०० जोड़ों का, ठाणे में ५०० जोड़ो का तथा सातारा में १००० जोड़ों का विवाह निःशुल्क सम्पन्न कराया गया | इन्दौर में स्वास्थ्य शिविरों द्वारा २५००० रोगियों का स्वास्थ्य परीक्षण एवं चिकित्सा, राष्ट्रचेतना पर्यावरण महायज्ञ के अन्तर्गत औरंगाबाद, उस्मानाबाद तथा सोलापूर में क्रमशः २५००० तथा २०००० तथा १५००० देव वृक्षों का वितरण, बीड में १५००० किसानों को निःशुल्क पशु खाद्यान्न वितरण तथा सातारा सूर्योदय हरिततीर्थ योजना में १०००० पौधों का रोपण किया गया |

सनातन संस्कृति के सबसे बड़े पर्व सिंहस्थ से हिन्दू जागरण – भय्यूजी महाराज 15 April, 2016

‘सनातन’ जिसकी उत्पत्ति से लेकर अन्त तक, कोई भाष्य या व्याख्या करना उतना ही सरल है, जिस प्रकार से अमरत्व को प्राप्त व्यक्तित्व की या स्वरुप की स्वीकरोक्ति अथवा उसका अस्तित्व | सनातन का अर्थ ही है, ‘नित्य नूतन इति सनातन’ अर्थात् जो प्राचीनतम होकर भी प्रति क्षण नया है, वही सनातन है | सनातन धर्म की सर्व समावेशी संस्कृति और इसका औदार्य, जो विभिन्न संस्कृतियों की धाराओं को स्वयं में एक महासागर समान समेटकर, अपने स्वरुप को विशाल से, विशालतम करने की प्रक्रिया को, निरन्तर चलायमान रखता है, इसका यही गुण इसे महान, अद्भुत, अद्वितीय और शाश्वत बनता है | सनातन धर्म को वर्तमान में हिन्दू धर्म के नाम से भी जाना जाता है और इसी हिन्दू धर्म अथवा हिन्दुत्व की विचारधारा तथा हिन्दू संस्कृति, सनातन धर्म के उत्पन्न विचारों का एक प्रवाह है | एक ऐसा प्रवाह जो अध्यात्म से सीधा धर्म-संवाद साधने का और उस धर्म को आचरण के रूप में परिभाषित कर, मानवीय संवेदना, जिसे हम शाब्दिक रूप में ‘समाज’ कहते हैं, उसका सम्पूर्ण निर्माण करता है | 
हिन्दुत्व एक ऐसा दर्शन है, जहां राष्ट्र, समाज और मानवता का भाव ममता और वात्सल्य से निर्माण होता है, इसलिए हमारी संस्कृति मातृत्व की संस्कृति है और मातृत्व की संस्कृति होने के कारण प्रत्येक पवित्र स्थिति और अवस्था को चाहे राष्ट्र हो, चाहे समाज हो, चाहे मानवता हो, चाहे नदियां हों, चाहे वृक्ष हों या गुरु हों, हम सभी को मातृत्व भाव के रूप में सम्मान देते हैं | मातृत्व का जो सबसे प्रमुख गुण है वह है सहिष्णुता; इसलिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जहां सहिष्णुता और असहिष्णुता के विषय पर विवाद हो रहा हो, बहस छिड़ी हो और यह एक मुद्दा बना हो, ऐसे में असहिष्णुता का विचार रखने वालों को, हिन्दू संस्कृति का समग्र दर्शन करना चाहिए |
 मातृत्व का जो दूसरा प्रमुख गुण होता है वह है सम्मान और स्वाभिमान | एक चार वर्ष के अपने नन्हें बालक को मातृत्व, सम्मान और स्वाभिमान से स्वराज्य की कैसे स्थापना की जाती है ? यह राष्ट्रप्रेम, सम्मान और स्वाभिमान से ओत-प्रोत, मातृत्व सिखाता है, सिद्ध रूप में जीजा माता और छत्रपति शिवाजी महाराज इसका उदाहरण हैं | तीसरा, मातृत्व का जो श्रेष्ठतम बोध होता है, वह होता है संस्कार | मूलतः भारतीय संस्कृति को विश्व की अन्य संस्कृतियों से श्रेष्ठ इसलिए माना जाता है; क्योंकि भारतीय संस्कृति की उत्पत्ति संस्कारों से हुई है | संस्कार अर्थात् परिमार्जन अथवा शुद्ध करना | जैसे खान से निकले सोने को तपाकर शुद्ध किया जाता है तभी उसकी उपयोगिता बढ़ती है, वैसे ही व्यक्ति जो भी कृति करता है उसे विधिपूर्वक करे तो ही उसकी सार्थकता है, इसे ही सुनिश्चित करने को प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे संस्कार करना कहा गया है और यह निर्विवाद तथ्य है कि संस्कारों की जननी ‘माँ’ है | हमारे दैनिक जीवन के विभिन्न क्रिया-कलापों से लेकर सामाजिक जीवन तक, सभी में संस्कारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है | हमारी दिनचर्या में प्रातः ब्रह्म-मुहूर्त में जागरण, जागरण के उपरान्त भूमि-वन्दना, भोजन से पूर्व प्रार्थना और उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने की कामना करना भी संस्कार के अन्तर्गत ही आता है | शयन के समय ईश्वर का स्मरण और व्यक्तिगत जीवन में सोलह संस्कारों का प्रचलन भी भारतीय सनातन संस्कृति की ही विशेषता है | संस्कार हमारी नैसर्गिक धरोहर हैं और हमारे मानवीय मूल्यों के प्रतीक भी हैं, इसलिए चाहे राष्ट्र संस्कार, मानवीय संस्कार या समाज संस्कार, कोई भी संस्कार हों, प्रत्येक संस्कार की उत्पत्ति मातृत्व भाव से होने के कारण, हिन्दुत्व का दर्शन, एक सम्पूर्ण मातृत्व का है, वात्सल्य का है, ममता का है और उसी के चलते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् हो या अनेकता में एकता हो अथवा चरित्र निर्माण की प्रक्रिया, सभी को हम मातृत्व भाव से, माँ के रूप में ही देखते हैं | 
हिन्दू दर्शन एक सम्पूर्ण मातृत्व स्वरुप को लेकर प्रकट होता है और उस प्रकट भाव में विभिन्न संस्कारों का एकत्रीकरण या विभिन्न संस्कारों का एकात्मता के सूत्र में बंधना और उस संस्कार प्रक्रिया के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की चैतन्यता निर्माण कर, सामान्यजन में चेतना का निर्माण कर, राष्ट्र समाज और मानवता की चुनौतियों का एक ऐसा मंथन करना, जिसमें विष, रत्न आदि सभी बाहर आने के पश्चात्, इन चुनौतियों को विचार और अपने सार्थक कर्मों से कैसे उत्तर दिया जा सकता है ? इसकी अमृत प्राप्ति का जो पर्व है, वह ‘कुम्भ’ है |
 कुम्भ एक मेला नहीं, कुम्भ एक परम्परा नहीं; अपितु कुम्भ एक सम्पूर्ण व्यवस्था है, जो विष का शमन कर अमृत पान कराने का ‘योग’ प्रदान करती है | इसलिए कुम्भ राष्ट्र-चिन्तन, सामाजिक-चिन्तन, मानवीय मूल्यों के चिन्तन का, एक ऐसा स्वरुप है कि जिसके द्वारा हम सामाजिक विकृतियों, आडम्बरों और कुरीतियों को दूर कर, प्रत्येक बारह वर्षों में, समाज की आवश्यकता तथा मानवीय मूल्यों की आवश्यकताओं को समझ कर, सही परिप्रेक्ष्य में हम सुधार कर सकें ! वह शरीर क्या जो अस्तित्व न जाने ? वह आत्मा क्या जो विरक्ति न जाने ? आत्मा से शरीर के मिलन का, अपने अस्तित्व का निर्माण करते हुए, सम्पूर्ण विरक्त किस प्रकार रहा जा सकता है ? इसका सम्पूर्ण दर्शन ‘हिन्दुत्व’ है और उस हिन्दुत्व का जो सूर्य समान प्रखर, तेजस्वी और दैदीप्यमान प्रकटीकरण है, वह कुम्भ है |
सर्व विदित है कि देश के चार स्थानों पर कुम्भ महापर्व का आयोजन प्रत्येक बारहवें वर्ष किया जाता है और उसे कुम्भ मेला कहा जाता है; किन्तु सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है, इसलिए इसे सिंहस्थ भी कहा जाता है | प्रकट अथवा प्रत्यक्ष रूप में कुम्भ अथवा सिंहस्थ के आयोजन के अनेक उद्देश्य हैं जैसे पुण्य-प्राप्ति, ज्ञानार्जन, सत्संग-लाभ, तीर्थाटन आदि | सनातन संस्कृति के मुख्य अध्यात्म शास्त्रीय सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त, कर्मफल न्याय सिद्धान्त भी है; अतः व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वही प्रतिफल रूप में उसे मिलता है | इसलिए अधिकाधिक पुण्य प्राप्त करने की क्रियाओं पर, प्रत्येक उस व्यक्ति का ध्यान रहता है जो सनातन धर्म तथा इसके मूल्यों में विश्वास रखता है | पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र-मंथन पश्चात् सुर-असुरों में अमृत वितरण के विवाद उपरान्त, अमृत-कलश से कुछ बूँदें जिन-जिन स्थानों पर गिरीं थीं, वहां कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है और वहां तीर्थाटन तथा उस अवधि में वहां स्नान करने से पुण्य-प्राप्ति होती है; परन्तु इसका अप्रत्यक्ष उद्देश्य ‘गूढ़’ है, जिसे समझे बिना भी इसका लाभ सामान्यजन को मिलता रहा है |
 हमारी सनातन संस्कृति के पुरोधा, दूरदृष्टि सम्पन्न ऋषि-मुनि, समय-समय पर इस कालजयी संस्कृति पर होने वाले आघातों से रक्षण हेतु एक व्यवस्था का निर्माण कर गए हैं | इसी क्रम में जब मध्यकाल में, आसुरी शक्तियां व विदेशी आक्रान्ता वैदिक सनातन धर्म संस्कृति तथा परम्पराओं का विनाश करने में लगे थे, तब आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ और शास्त्र के द्वारा वैदिक धर्म परम्पराओं एवं मान्यताओं का रक्षण कर, वैदिक सनातन धर्म को पुनर्स्थापित किया । शास्त्रार्थ से समझ, सद्भावना व संचेतना समृद्ध होती है; परन्तु इस समझ, सद्भावना व संचेतना के प्रवाह को भी निरन्तरता की आवश्यकता है | शास्त्रार्थ की सार्थकता तथा उसकी लक्ष्य प्राप्ति हेतु उपयुक्त स्थान, उपयुक्त विद्वान, उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता होती है, साथ ही शास्त्रार्थ के मंथन से प्राप्त ज्ञान रूपी ‘अमृत’ का समाज में वितरण, और यह वितरण समान रूप में देश के कोने-कोने में हो इस हेतु, तत्कालीन कालानुसार जो सर्वश्रेष्ठ माध्यम था वह है ‘कुम्भ महापर्व’ | यद्यपि तकनीक एवं सम्प्रेषण के साधनों की बहुतायत के युग में भी, कुम्भ की प्रासंगिकता तथा सार्थकता न्यून नहीं होती; अपितु और भी अधिक बढ़ गई है, क्योंकि हम यह समझ ही नहीं पाए हैं कि इन साधनों से हम एक-दूसरे के निकट आए हैं या हमारी परस्पर दूरियां और बढ़ गई हैं | किन्तु कुम्भ जैसे महापर्व हमारी इन दूरियों को मिटाने का सामर्थ्य निश्चित रूप से रखते हैं | जब हम अपने अपने आधुनिक सम्प्रेषण यंत्रों के साथ घर में होते हैं, तब भी अपने ही आभासी संसार में, समूह का भ्रम लिए, एकाकी ही होते हैं | जबकि कुम्भ जैसे महापर्व में परिवार तथा मित्रों के साथ पवित्र स्नान हेतु एक साथ डुबकी लगाना, यथार्थ में हमें एक परिवार के रूप में जोड़ता है | यह सामान्य सी; किन्तु अत्यन्त प्रभावकारी विशेषता है, जो कुम्भ हमें प्रदान करता है |
भारतवर्ष जैसे राष्ट्र की सांस्कृतिक विशेषताओं तथा विभिन्नताओं को देखते हुए इसे एकसूत्र में बाँधने की कल्पना को साकार रूप भी कुम्भ मेले से ही मिलता है | चार स्थानों पर कुम्भ परम्परा प्रारम्भ करने का श्रेय आद्य गुरु शंकराचार्य को ही दिया जाता है । यह स्वाभाविक भी लगता है; क्योंकि आद्य गुरु शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना की, जिसके कारण चार धाम की तीर्थयात्रा का प्रचलन हुआ । मान्यता यह भी है कि उन्होंने ही भारत की सन्तशक्ति को संगठित किया और भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग में धर्म-चेतना जगाने का दायित्व उन्हें सौंपा । इसके पीछे राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, एकता तथा एकात्मता को जागृत करने एवं सुदृढ़ करने का दृष्टिकोण निहित था |
सिंहस्थ के अप्रत्यक्ष तथा गूढ़ उद्देश्यों में से एक अन्य उद्देश्य है, हिन्दू जागरण और  हिन्दू जागरण ही हिन्दुत्व की मूल-भावना है | ‘हिन्दू’ केवल एक शब्द नहीं है; अपितु यह एक विराट स्वरुप लिए, स्वयं में महान परम्पराओं तथा इतिहास को आत्मसात् किए हुए, एक सार्वभौम संस्कृति के उदात्त प्रकाश को प्रसारित करता ऐसा सूर्य है, जो मानवीय सभ्यता को अनन्त युगों से प्रकाशित कर रहा है | इसी हिन्दू शब्द को अपने अस्तित्व से ऊर्जा प्रदान करने वाली मानवीय सभ्यता तथा इसके वाहक ‘हिन्दू’ हैं | इन्हीं हिन्दुओं का जागरण और उनमें अपनी परम्पराओं के अनुरूप, चेतना का सम्प्रेषण भी ‘सिंहस्थ’ जैसे महापर्वों के माध्यम से ही होता है | सिंहस्थ जहाँ विभिन्न साधना मार्गों से साधना करने वालों का एकत्रीकरण होता है, संवाद होता है, वहां सामान्य व्यक्ति की जिज्ञासा का समाधान भी सहज ही हो जाता है | यह समाधान उसे एक सन्तुष्टि प्रदान करता है और यह सन्तुष्टि, श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती है, जिसकी परिणति समष्टि रूप में, अन्य व्यक्तियों तक हिन्दुत्व का प्रसार करने की प्रेरणा तथा शक्ति प्रदान करती है, यही वास्तविक हिन्दू जागरण है | 
हिन्दू को आर्य भी कहा गया है और आर्य का शाब्दिक अर्थ होता है, श्रेष्ठ | वेद भी कहता है ‘कृण्वन्तो विश्वं आर्यम’ अर्थात् सभी (सम्पूर्ण विश्व को) को श्रेष्ठ बनाएंगे | यह श्रेष्ठता आवरण से नहीं, आचरण तथा अंतःकरण से अभिव्यक्त होना चाहिए | हम हिन्दू शब्दानुसार ‘हीनानि गुणानि दुष्यति इति हिन्दू’ अर्थात् स्वयं के हीन गुणों को दूर कर हिन्दू बनें और दूसरों को भी बनाएं ! यथार्थ रूप में हिन्दू होना श्रेष्ठता का परिचायक है | यदि विश्व का प्रत्येक व्यक्ति अपने दुर्गुणों को दूर कर ‘आर्यत्व’ को प्राप्त करले तो उसकी आत्मिक उन्नति में किसी भी प्रकार का संशय हो ही नहीं सकता, फिर चाहे वह किसी भी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय, साधना-मार्ग का ही अनुयायी क्यों न हो ? व्यक्ति अपने षडरिपुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर पर विजय पा ले तो उसकी व्यक्तिगत, भौतिक, व्यावहारिक, सामाजिक तथा सभी प्रकार की समस्याओं का अन्त हो जाएगा और श्रेष्ठता को वास्तविक रूप में प्राप्त कर लेगा | श्रेष्ठता के इसी भावरूपी अमृत को पाने की प्रक्रिया का मंथन भी सिंहस्थ में ही होता है और यह भी हिन्दू जागरण का ही प्रतीक है |
सिंहस्थ कुम्भ जैसे महापर्वों का आध्यात्मिक ही नहीं वरन सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व भी है | हमारा भारत जो महानगरों तथा नगरों से अधिक ग्रामों में बसता है, वहां के परिवेश में पलने वालों के लिए भी कुम्भ अपनी उपयोगिता सतत् सिद्ध करता रहा है | इसी कुम्भ के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रभाव में लाने के लिए, प्रत्येक वर्ग के साथ न्याय करने के लिए, सम्पन्नता और विपन्नता का भेद मिटाने के लिए, समता और समरसता को परिभाषित करने के लिए, राष्ट्रवाद का, समाजवाद का शंखनाद करने के लिए, आवश्यकता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और धर्म, यह अन्तिम व्यक्ति तक सरलतम पद्धति से पहुंचे और कुम्भ के माध्यम से हम परिवर्तन का स्वरुप सामने लेकर आ सकते हैं और हमें लाना है | आज हमें समस्याओं का समाधान खोजना होगा और ऐसा पर्व जहां लाखों-करोड़ों लोग आस्था के साथ आते हों, उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान, यदि कुम्भ के माध्यम से हो तो कुम्भ की सार्थकता और बढ़ सकती है | जैसे कृषि विकास, ग्रामीण विकास, पशु संवर्धन, जल का नियोजन, पर्यावरण सन्तुलन, मातृशक्ति पर हो रहे अनेक प्रकार के अत्याचार हों, समाज में बढ़ती व्यभिचारिता हो, कुठाराघात हों, उस पर प्रहार करने वाले विचार और कार्यों का प्रदर्शन, जिसका लाभ धर्म के साथ हमारे सांसारिक जीवन में भी श्रद्धावान को प्राप्त हो, ऐसे कार्य करने की आवश्यकता है और इस आवश्यकता की पूर्ति सहज रूप से कुम्भ के माध्यम से हो सकती है |

कुम्भ महापर्व सनातन संस्कृति के उद्भव का भी माध्यम है | सनातन संस्कृति की व्यापकता को समझने के लिए इस संस्कृति द्वारा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की प्रार्थना का उदाहरण ही पर्याप्त है | सनातन संस्कृति के सिद्धान्त इसे महानता और अमरत्व प्रदान करते हैं | एक ओर जहाँ विश्व में अनेक प्राचीन और नवीन संस्कृतियाँ विद्यमान हैं, कई संस्कृतियाँ समय-समय पर उत्पन्न हुईं और काल के गाल में समा गईं, वहीं सनातन संस्कृति आज भी अपने मूल रूप में विद्यमान है | यद्यपि इस संस्कृति की ‘आत्मा’ पर विकृतियों का आवरण चढ़ा हुआ दिखाई देता है, तथापि इसकी जीवन्तता में कोई न्यूनता (कमी) नहीं आई है | जहाँ तक आवरण की बात है, तो उस आवरण को उतारने हेतु प्रयास सदैव होते ही रहे हैं, इसी कारण यह आज के ऐसे युग में भी चैतन्यता लिए विद्यमान है, जिस युग में अन्य संस्कृतियाँ केवल आत्म-केन्द्रित हो, हिंसा के क्रूरतम स्वरुप के साथ मात्र अपने मत की स्थापना में लगी हुई हैं और विश्व के साथ ही सम्पूर्ण मानवता के लिए भी घोर संकट बन गई हैं |
ऐसे समय सनातन संस्कृति की विश्व-पटल पर भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है; क्योंकि अन्य संस्कृतियाँ केवल मानवीय मूल्यों की बात करती हैं और उसे अपनी महानता समझती हैं | वहीं सनातन संस्कृति मानव और मानवता से भी आगे, सम्पूर्ण विश्व के मंगल की कामना करती है | केवल मानव ही नहीं, पशु-पक्षी, जलचर, नभचर, जड़-चेतन, सजीव तथा निर्जीव सभी के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना सिखाती है; क्योंकि इस संस्कृति का मूल तत्त्व मातृत्व भाव है |  यह सभी में उस एक परमात्मा के स्वरुप ‘ब्रह्म’ का दर्शन करना सिखाती है | मानवीय मूल्यों का संरक्षण, विचारों की परिपक्वता, भाषा की सौम्यता एवं उच्चता, आदर्श समाज रचना तथा जीवन पद्धति का समुचित मार्गदर्शन इस संस्कृति के वैशिष्ट्य को दर्शाते हैं | भोग यदि अनिवार्य है तो सनातन संस्कृति त्यागमय भोग के मार्ग का अनुसरण करने को कहती है और दातुन हेतु भी वृक्ष की शाखा तोड़ने के पूर्व वृक्ष से प्रार्थना कर उसकी अनुमति लेने और वृक्ष के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करने का भाव इस सनातन संस्कृति में अन्तर्निहित है |
सनातन संस्कृति प्रकृति के प्रति करुणा का जो भाव रखती है, उसका एक उदाहरण है कृषि | यदि हम गेहूं का उदाहरण लें तो इस तथ्य से सभी परिचित ही है कि जो अन्न खेतों में उत्पन्न करते हैं, उस पर सम्पूर्ण अधिकार नहीं रखते; अपितु उस पर दूसरों का भी अधिकार हैं, जैसे उर्वरक के रूप में खेत का, चारे के रूप में पशुओं का, आहुति के रूप में अग्निदेव का, दानों के रूप में पक्षियों का, आटे के रूप में चींटियों का, रोटी के रूप में गोमाता, श्वानों (कुत्तों) आदि सभी का अधिकार मानते हैं, यह भी इस सनातन संस्कृति की विशेषता है |
    इसी यज्ञमय संस्कृति के अपनी सम्पूर्ण विराटता तथा समग्रता के साथ कुम्भ महापर्व में दर्शन होते हैं | चारों ओर यज्ञ, अन्नक्षेत्र, जिसमें स्नेहपूर्वक, आग्रहपूर्वक यात्रियों को बुलाकर भोजन करवाना, इस शाश्वत संस्कृति के मूल्यों के प्रकटीकरण को सिद्ध करता है | इस संस्कृति के शाश्वत तत्त्व को अक्षुण्ण रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं ‘कुम्भ’ जैसे महापर्व और सनातन संस्कृति के उद्भव के लिए कुम्भ महापर्व की यही उपादेयता है |

BE ENTHUSIASTIC -- IT CHANGES MEDIOCRITY TO EXCELLENCE 11 April, 2016


Friends, a great philosopher once said -- `Nothing great is ever achieved without enthusiasm.' It is literally true. Enthusiasm and success go hand in hand, but enthusiasm comes first. Enthusiasm is priceless. It inspires confidence, raises your morale and builds your loyalty. Enthusiasm is contagious. You can feel enthusiasm by the way a person talks, walks or shakes hands. Enthusiasm is a habit that one can acquire and practice.

Many decades ago, a man called Charles Schwab, who was earning a salary of a million dollars a year, was asked if he was being paid such a high salary because of his exceptional ability to produce steel. Charles Schwab replied, "he considers his ability to arouse enthusiasm among the men the greatest asset he possesses, and the way to develop the best that is in a man is by appreciation and encouragement."

That is the power of enthusiasm and appreciation. Live while you are alive. Don't die before you are dead.
Enthusiasm and desire are what change mediocrity to excellence. Water turns into steam with a difference of only one degree in temperature and steam can move some of the biggest engines in the world. hat is what enthusiasm helps us to do in our lives. So be enthusiastic and appreciative.

DO GOOD AND DON'T EVER STOP DOING GOOD 28 March, 2016

Friends, the goodness in us never goes in vain, it pays us back in crunch situations and help us overcome the hardest of our time. The story that I am talking about will give you a deep insight the values and importance of good things that we do in our lives. Here goes the story ----

A woman baked chapatti (roti) for members of her family and an extra one for a hungry passerby. She kept the extra chapatti on the window sill, for whosoever would take it away. Every day, a hunchback came and took away the chapatti. Instead of expressing gratitude, he muttered the following words as he went his way: “The evil you do remains with you: The good you do, comes back to you!” This went on, day after day. Every day, the hunchback came, picked up the chapatti and uttered the words:


“The evil you do, remains with you: The good you do, comes back to you!” The woman felt irritated. “Not a word of gratitude,” she said to herself… “Everyday this hunchback utters this jingle! What does he mean?” One day, exasperated, she decided to do away with him. “I shall get rid of this hunchback,” she said. And what did she do? She added poison to the chapatti she prepared for him!

As she was about to keep it on the window sill, her hands trembled. “What is this I am doing?” she said. Immediately, she threw the chapatti into the fire, prepared another one and kept it on the window sill. As usual, the hunchback came, picked up the chapatti and muttered the words: “The evil you do, remains with you: The good you do, comes back to you!”

The hunchback proceeded on his way, blissfully unaware of the war raging in the mind of the woman. Every day, as the woman placed the chapatti on the window sill, she offered a prayer for her son who had gone to a distant place to seek his fortune. For many months, she had no news of him. She prayed for his safe return.

That evening, there was a knock on the door. As she opened it, she was surprised to find her son standing in the doorway. He had grown thin and lean. His garments were tattered and torn. He was hungry, starved and weak. As he saw his mother, he said, “Mom, it’s a miracle I’m here. While I was but a mile away, I was so famished that I collapsed. I would have died, but just then an old hunchback passed by. I begged of him for a morsel of food, and he was kind enough to give me a whole chapatti. As he gave it to me, he said, “This is what I eat everyday: today, I shall give it to you, for your need is greater than mine!”

” As the mother heard those words, her face turned pale. She leaned against the door for support. She remembered the poisoned chapatti that she had made that morning. Had she not burnt it in the fire, it would have been eaten by her own son, and he would have lost his life!

It was then that she realized the significance of the words: “The evil you do remains with you: The good you do, comes back to you!” Friends, the moral of this story is that we should always do good and don’t ever stop doing good, even if it is not appreciated at that time. And last but not the least, I request you all whatever extra chapaatis that are baked in your house, pl do not throw it away, instead give it to those who really need it to satisfy his/her hunger. My Trust has already started `Roti Bank’ scheme which is primarily intended to feed the hungry stomach. Under the scheme, our Trust’s volunteers collect `chapaatis’ from individuals, families and distribute the same among hungry street children, kin of poor patients at govt and private hospitals of Indore. We intend to introduce this scheme in other cities of the country as well in near  future.


जो प्रयत्न करता हे उसे यश प्राप्त होता है- प. पू. भय्यूजी महाराज 13 January, 2016

मकर संक्रांति पर विशेष जो प्रयत्न करता हे उसे यश प्राप्त होता है- प. पू. भय्यूजी महाराज जीवन में यश कीर्ति और जीवन स्वाभिमान पूर्वक हो, यही व्यक्ति की कामना होती है। आने वाले दिन अच्छे हो, अच्छा सोचेंगे तो अच्छा होगा। मकर संक्रांति इसी अच्छे सोचने का उत्सव है। सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। अंधकार से प्रकाश की और ले जाने वाला पर्व मकर संक्रांति है। आज राष्ट्र में, समाज में, हमारे अपने व्यवहार से ही अंधकार निर्माण हो रहा है। प्रकाश की और जाना जीवन है और अंधकार में रहना पतन है। 

अंधकार अनेक प्रकार का होता है। हमारी मानसिकता का अंधकार, अपने आचरण में आया अंधकार, अपने व्यवहार में आया अंधकार, अपनी सेवा भाव में आया अंधकार, समाज और मानवता के बीच आया अंधकार। इस अंधकार से ऊपर उठकर चिंतन करना और उस अनुरूप कार्य करने का संकल्प लेना ही मकर संक्रांति है। 

मनुष्य को अपने जीवन में एक लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। लक्ष्य के अनुरूप की गई साधना से ही मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। व्यक्ति के लक्ष्य नहीं होने से भटकाव है। हम देखते है कि हर व्यक्ति दौड़ रहा है। कभी-कभी उसे यह भी पता नहीं होता है कि वह क्यों दौड़ रहा है। कही शादी में जाना है, तो दौड़ रहा है। किसी से मिलने जाना है, तो दौड़ रहा है। किसी के अंतिम संस्कार में जाना है, तो दौड़ रहा है। बस वहाँ तक पहुँचने का ही लक्ष्य है। कई बार व्यक्ति के पास एक ही लक्ष्य होता है कि दिन कैसे व्यतीत करना है। फिर वह अपने सायंकाल का समय कैसे व्यतीत करना है उसमे खो जाता है। शाम कैसे बीतेगी इस कल्पना में रहना ही चिंता है। परिस्थितियाँ जब तक हमारे सामने नहीं आती तब तक उसके बारे में सोचना व्यर्थ है। व्यक्ति को सार्थक योजनाओं का चिंतन करना चाहिए। प्रयत्न से ही यश प्राप्त होता है। अपयश की कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। 

व्यक्ति के जीवन में कई बार ऐसा भी समय आता है, जब उसे अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है। वह सोचता है कोई मुझसे प्रेम नहीं करता कोई मेरी बात नहीं मानता। कोई मेरी और देखने को तैयार नहीं है परंतु यह मानसिकता ही व्यक्ति को घोर अंधकार की और ले जाती है। मेरा जीवन कितना सार्थक है। परिस्थितियों को कैसे बदला जा सकता है। उसके लिए संयम आवश्यक है। नौ दिन व्यक्ति कठिन उपवास करता है। ईश्वर को धन्यवाद देता है कि मुझसे यह कठिन तप करवा लिया। आपकी कृपा मुझ पर रहे और स्वयं को धन्य समझता है। वही व्यक्ति यदि ऑफिस से आने के बाद चाय मिलने में देर हो जाती है तो क्रोधित हो जाता है। यह परिस्थिति वश होता है। व्यक्ति को जीवन की सार्थकता के लिए वैसी परिस्थिति निर्मित करनी होगी। प्रत्येक परिस्थिति को पहचानने वाला व्यक्ति आज पत्थर का हो गया है। इसलिए आज सारी विसंगतियां निर्माण हो रही है। पर पत्थर के भीतर भी जल का स्त्रोत होता है, सुप्त पड़ी नदी में भी पानी का स्त्रोत है। परिस्थिति के कारण वह नदी सुख गई है। आज परिस्थिति के कारणों से व्यक्ति एक दूसरे से छल कर रहा है। नकारात्मकता निर्माण हो रही है। समाज की नकारात्मकता से राष्ट्र में भी नकारात्मकता निर्माण हो गई है। हम कहते है राष्ट्र में कुछ सही नहीं हो रहा है। यह नकारात्मकता तब खत्म होगी जब व्यक्ति अपने चिंतन की सकारात्मकता देगा। सकारात्मक व्यवहार करेगा। व्यक्ति सामान्य जनो में सामान्य सा आचरण करेगा। 

श्रीकृष्ण यदि सिंहासन पर बैठकर राज्य करते और सिर्फ आदेश ही देते तो वे हमें अपने नहीं लगते। परंतु वे सामान्य व्यक्ति की तरह सामान्य से ग्वाल बालों में रहे, गौएँ चराने जाते थे। श्रीराम ने वनवासी जीवन को अपनाकर रीछ और वानरों को अपने साथ रखा। उनके गुणों का विस्तार करके लंका में राक्षसी प्रवत्तियों को खत्म करने के लिए वानरों की सहायता ली। यह हमारे संस्कृति का गौरव है इसलिए श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजे जाते है। आज शिक्षा अर्थ के आधार पर हो गई है। इसलिए व्यक्ति संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है। समाज में वृद्धाश्रम, अनाथाश्रम बढ़ रहे है, जो स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं है। ऐसी नकारात्मक वृत्ति को हमें हटाना होगा। नकारात्मकता के कारण ही समाज में एक दुसरो को निचा दिखाने की प्रवत्ति व्याप्त हो गई है। कई बार दिल्ली में हुई घटना के बारे में लोग मुझसे पूछते है कि इस बारे में आपकी क्या राय है? यह भी कहते है कि महिलाओं का पहनावा इसके लिए जिम्मेदार है। उस समय उन्हें एक उदाहरण देता हूँ वह यह है कि हमारी संस्कृति में प्रत्येक का सम्मान करने की परंपरा है। संस्कृति की विशेषता है - सम्मान।  

सम्मान को दर्शाने के लिए ही स्वयं भगवान ने अर्धनारी नटेश्वर का अवतार लिया। अर्थात प्रेम और पुरुषार्थ। यदि तुमने नारी से बोलते समय मातृत्व शक्ति का भाव जाग्रत कर लिया तो वासना कभी निर्माण होगी ही नहीं। मातृत्व शक्ति का सम्मान हो, हमारे मन में यही विचार होना चाहिए तभी हम नारी का सम्मान कर सकते है। आरोप लगाने की शैली हमारे जीवन में अधिक दिखायी देती है।  

पहले भी षड़यंत्र होता था। परंतु अब षड़यंत्र घर से प्रारंभ होकर राष्ट्र तक है। संगठन से लेकर व्यक्ति तक चल रहा है। एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी है। अपनी चिंता उसी में है कि सामने वाले व्यक्ति को नीचा कैसे दिखाएँ। कई बार व्यक्ति मुझसे प्रश्न पूछते है, परन्तु प्रश्न वह अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने के लिए नहीं पूछते बल्कि वे अपने अहंकार स्वरुप पूछते है। प्रश्न पूछने से तुम्हारे भीतर का विवेकानंद यदि जाग्रत होता है, तुम्हारी जिज्ञासा शांत होती है तो वह प्रश्न पूछना भी सार्थक होता है। प्रश्न पूछकर सामने वाले व्यक्ति को नीचा मत दिखाओ, उसे पीड़ा मत दो।  

हम एक दूसरे की हैसियत दिखाते है चाहे वह अर्थ के धरातल पर हो, चाहे धर्म क्षेत्र में हो, चाहे राजनीति के क्षेत्र मे। घर में है तो अस्तित्व की हैसियत एक दूसरे के सम्मान की हैसियत दिखाते है। क्या यही है हमारी स्वतंत्रता? क्या हमारे राष्ट्रवीरों ने धर्मवीरों ने इसी समाज की कल्पना की थी? हमारे राष्ट्रवीरों ने तो कुछ अलग राष्ट्र की कल्पना की थी। हमारे स्वार्थो ने इस समाज को राष्ट्र को विषम परिस्थितियों में पुनः लाकर खड़ा कर दिया है। हमें परिस्थितियों को बदलना होगा। 

जो मानवीयता का विचार करके परिस्थितियों के अनुकूल आचरण करता है, वही धर्म के अनुकूल आचरण करता है। धर्म जीवन जीने की पद्धति है इस पद्धति को अधिक सुन्दर अधिक उपयोगी बनाएँ, इसका विचार हमें करना होगा। क्योंकि प्रयत्न करने पर ही सफलता प्राप्त होती है। प्रयत्न नहीं करेंगे, केवल चिंता करेंगे तो उससे न हम अपना भला कर सकेंगे न दूसरों का। अतः लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सही चिंतन की धारा अपनाकर प्रयत्न करने ही होंगे, यही संकल्प अनेक मानसिक अंधकारों से हमें दूर रखेगा और हम सूर्य की तेजस्वी किरणों में स्वयं को सकारात्मक चिंतन देने वाले इस देश के नागरिक होंगे। 

जयहिंद, जय भारत

सीखने की प्रवृत्ति को जाग्रत करने वाला पर्व गुरुपूर्णिमा 06 July, 2017

सीखने की प्रवृत्ति देने वाला प्रकाश पूर्णिमा है और सीखने की प्रवत्ति को जाग्रत करने वाला पर्व 'गुरुपूर्णिमा' है। गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। श्री वेदव्यासजी ने चारों वेदों का संपादन कर अनेक पुराणों की रचना की। पुराणों के माध्यम से उन्होंने मानव जाती को कल्याण का मार्ग दिखाया। जो कल्याण का मार्ग दिखता है, वह गुरु है। साधक इस व्यास पूर्णिमा पर गुरु पूजन करते है। अपने गुरु के प्रति सम्मान आदर प्रकट करने का यह दिन होता है। 

प्रकृति के अनुसार यदि हम चलते है तो आषाढ़ पूर्णिमा वर्षा के प्रारम्भ की घोषणा करती है। ग्रीष्म ऋतु में मेघो के पास जो संचित जल होता है, वह पृथ्वी पर आने के लिए उत्सुक रहता है, जो नवजीवन का प्रतिक है। यही समर्पण का भी प्रतीक है। साथ ही जो तत्व ज्ञान हमने अर्जित किया है, उसे सत्कार्य में परिणित करने का यह दिवस होता है। अनेक शिष्य गुरुपूर्णिमा से ही साधना प्रारम्भ करते है, क्योंकि इस दिन गुरु शिष्य पर कृपा बरसाते है। गुरु अपने शिष्य को भक्ति का मंत्र देते है। उस भक्ति से वह ईश्वर की आराधना कर अपने दिव्य गुणों का प्रसार और विस्तार करता है। भक्ति मंत्र के बदले में गुरु शिष्य से सत्कार्यों के प्रति समर्पण चाहते है। शिष्य के लिए गुरुपूर्णिमा इसलिए विशेष होती है कि जो कुछ आध्यात्मिक जगत में सीखा है, सुना है, देखा है, उन सबको एकत्रित करके विश्व प्रेम की भावनाओ को साकार करना, जिससे वसुधैव कुटुंब का भाव जाग्रत हो। पुरे वर्ष भर शिष्य इसी दिन की प्रतीक्षा करता है,  क्योंकि गुरु की दृष्टि ही साधक के मोहपाश को काटती है और उसे नवीन राह दिखाती है। एक बार एक नवदीक्षित शिष्य ने गुरु से कहा- गुरुदेव उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की और चित्त दृढ़  नहीं होता। गुरु ने गंभीर दृष्टि डालकर शिष्य की और देखा और शिष्य से कहा- सच कहते हो वत्स, यहाँ ध्यान नहीं लगेगा। आज सायंकाल ही हम यहाँ से प्रस्थान करेंगे। शिष्य ने कुछ डरते हुए संकोच करते हुए पूछा- सायंकाल प्रस्थान करेंगे? गुरु ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया। गुरु शिष्य सायंकाल दूसरे स्थान पर प्रस्थान करने हेतु चल पड़े। शिष्य के हाथ में एक झोला था, जिसे वह बड़े यत्न से संभाल रहा था। चलते समय भी उसका ध्यान उस झोले पर अधिक था। मार्ग में एक कुआँ आया। दोनों ने अपनी प्यास बुझाई और थोड़ा विश्राम करने का सोचा। इतने में शिष्य ने शौच की आशंका जताई और गुरु को अपनी झोली देकर वह चल दिया। जाते- जाते अनेक बार उसने झोली की तरफ देखा। कुछ दूर जाने पर उसे धड़ाम एक तीव्र प्रतिध्वनि सुनाई दी। उसे यह अनुभव हुआ कि कोई वास्तु कुएं में समां गई है। शिष्य दौड़ा हुआ आया और चिंतित स्वर में बोला- गुरुवार, झोले में सोने की ईंट थी, वह कहां गई। गुरुदेव ने शांत स्वर में कहा- कुएं में चली गई। अब कहे तो चले या फिर पुनः अपनी जगह ही लौटें। अब तुम्हे ईश्वर में ध्यान लगने की कोई चिंता नहीं रहेगी। शिष्य ने एक दीर्घ श्वास छोड़ते हुए कहा- सच है गुरुदेव, आसक्ति का मन से परित्याग किये बिना कोई भी ईश्वर में मन नहीं लगा सकता। 

गुरु वह है जो आसक्ति को हमारे भीतर से निकाल कर शिष्य को भक्ति का मन्त्र देते  है। इस भक्ति से शिष्य संतुष्टि की संपत्ति प्राप्त करता है, जिससे जीवन में अनेक समस्याओ का वह सामना करता है। गुरु कहते है समस्त जगत को गुरु स्वरूप देखो। गुरु वह है जो हमारे ज्ञान का विस्तार करते है। प्रकृति में प्रत्येक तत्व ऐसा है, जो हमें कुछ न कुछ गुण देता है। जब हम इस प्रकृति को समझते है, इसके गुण तत्व को समझते है तो हम सद्गुणी हो जाते है। भगवान दत्तात्रय ने स्वयं अपने जीवन में 24 गुरु बनाये और मानव जाती को यह बताया कि प्रत्येक पदार्थ में विशेष गुण होता है। उस गुण को हमें आत्मसात करना चाहिए। जब समस्त जगत को गुरु स्वरुप देखोगे तो प्रत्येक वस्तु का आदर करोगे। गुरु पूर्णिमा इसी संकल्प को स्मरण करने का दिवस है, जिससे अनंत सवेंदनाओ का विस्तार होता है और सत्कार्य मूर्तरूप लेकर हमारे सामने होते है। हम ग्रहणशीलता के मूर्तरूप बने। अपनी क्षुद्र अहम भावना से रिक्त रहे, तब प्रकृति की समस्त निधियां हमारे भीतर समाती है और शिष्य अपने श्वासों में उस शुद्धता को अनुभव करता है, जो पर्वत से गुजरने वाली हवाओं की तरह शुद्ध और सात्विक है। यही अनुभव ही गुरु पूर्णिमा है। 


परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है 09 May, 2015

एक सन्त के आश्रम में एक शिष्य कहीं से एक तोता ले आया और उसे पिंजरे में रख लिया। सन्त ने कई बार शिष्य से कहा कि “इसे यों कैद न करो। परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।” किन्तु शिष्य अपने बालसुलभ कौतूहल को न रोक सका और उसे अर्थात् पिंजरे में बन्द किये रहा।

तब सन्त ने सोचा कि “तोता को ही स्वतंत्र होने का पाठ पढ़ाना चाहिए” उन्होंने पिंजरा अपनी कुटीमें मँगवा लिया और तोते को नित्य ही सिखाने लगे- ‘पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।’कुछ दिन में तोते को वाक्य भली भाँति रट गया। तब एक दिन सफाई करते समय भूल से पिंजरा खुला रह गया। सन्त कुटी में आये तो देखा कि तोता बाहर निकल आया है और बड़े आराम से घूम रहा है साथ ही ऊँचे स्वर में कह भी रहा  है- “पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।”सन्त को आता देख वह पुनः पिंजरे के अन्दर चला गया और अपना पाठ बड़े जोर-जोर से दुहराने लगा। सन्त को यह देखकर बहुत ही आश्चर्य हुआ। साथ ही दुःख भी।वे सोचते रहे “इसने केवल शब्द को ही याद किया! यदि यह इसका अर्थ भी जानता होता- तो यह इस समय इस पिंजरे से स्वतंत्र हो गया होता! कहने का तात्पर्य यह कि - हम सब भी ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें सीखते और करते तो हैं किन्तु उनका मर्म नहीं समझ पाते और उचित समय तथा अवसर प्राप्त होने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते और जहाँ के तहाँ रह जाते हैं |